Saturday, July 24, 2010

कल के सूरज


बिना चाँद की रात में
चमकती उस की मुस्कान है
सपने बुनती बैठी उस के गोद में
बच्चे का खिलता बचपन है

कहानी सुनाकर लोरी गा रही है
बच्चा तो बहाना है, खुद को सुनाती लोरी है
पेड़ों के झुण्ड से उठी ठंडी हवा
झोकें से बदन को छुआ है
पलकों में जमी नींद भी


झोंकें के संग चल बसी है
"माँ" कहतेहुए बच्चा दूध भरे सीने के और बढ़ा 
हैअपने नुर्म स्पर्श से नाभि के गहराई में
 चाहत कि चिंगारी भड़काया है
मगर उसे बुझानेवाले ने भटक भटक के घर को भूला है


जीवन के अँधेरी झोपड़ी मेंरोशनी घुसने के लिए छल्ले भी नहीं है
फिर भी वह औरत जीती है, रोशनी के इंतज़ार में
सीना चूसकर सपने जगानेवाले बच्चे के लिए
रोशनी लानेवाले "कल के सूरज" के उदय के लिए

Thursday, June 10, 2010

मेरे संग

कोई न कोई फूल खिलेगा
मेरे जैसा कौन मिलेगा

हँसी उडाती रहेगी ये दुनिया
किस के आँसूं कौन पियेगा

हर कदम पर कदम है मेरे
सिवा मेरे, साथ कौन चलेगा

जान बचाने की पड़ी है सब को
मरनेवाले के साथ
भला कौन मरेगा

Wednesday, March 24, 2010


स्थिति

फिर वही रासतें
फिर वही राह गुज़र 


जाने हो या ना हो
मेरा घर वो नगर


ये कहानी नहीं
जो
सुनादूँगा मै 


जिंदगानी नहीं
जो
गवाँ दूंगा मै

छाव
भी धूप की तरह गुज़री मेरी 
अब जो दीवार आए , गिरादूंगा  मैं 

तेरा आँचल रहा
आसमाँ की तरह



सारे मौसम गए
फिजा की तरह


साये की तरह 

सब दूर होते गए 


सिर्फ खुशबू रही 
दिल की घाव की तरह

Sunday, December 20, 2009





प्राप्ति

सुख को पाते है लोग
धन दौलत में
इज्जत और शोहरत में,
कुछ ही लोग
प्यार और स्नेह में
मगर एकाध कोई
फूलों के मुस्कराहट में
माँ की पुरानी
साडी की नरमी में
गरीब भिकारी के गाने के आलाप में

Friday, December 18, 2009




एक बार


तेरी गोद में सर रखकर रोने दो
मेरी दर्द की दरिया को बहने दो
ऐ सहेली...जीने के दिन हैं ही दो
तुम एक बार फिर मुस्कुरा दो
बिनती

बरसों मेघा बरसों
जोर जोर से बरसों
मगर इतना जोर से नहीं कि,
मेरी नजूक सखी
बारिश में भीग न पाए
बूंदों से खेल न पाए

फोटोग्राफर

लोगों के खुशियों को 
रंग-रंगीन तसवीर बनाकर
उन के मीठे मीठे यादों को जोड़ कर
उन्हें देता है 
फिर से याद करने के लिए.... 

और अपने लिए बचा लेता है
उन यादों के बेरंग नेगेटिव्स

और अनजान
भीड़ वाला अकेलापन

Tuesday, November 17, 2009





ಪರಿಹಾರ

ಮನವು ಮಗುಚಿ ಬಿದ್ದು ಮಗುವಿನಂತೆ
ಹಠ ಮಾಡಿ ಅತ್ತು ಕರೆದಾಗ
ಮುದ್ದಿಸಿ ಸಂತೈಸುವ
ತಾಯಿಯೇ ಏಕಾಂತ...

Friday, November 13, 2009

ದುಃಖ
 


ನಾನು ಬರೆದ ಕವಿತೆಗಳು
ನನ್ನೊಂದಿಗೆ
ಕದನಕ್ಕಿಳಿಯುತ್ತವೆ
ಕನಲಿ
ಕಣ್ಣೀರಾಗುತ್ತವೆ
ನಾನು
ಅವುಗಳಲ್ಲಿ ತುಂಬುವ
ದುಃಖವನ್ನು
ಹೊತ್ತುಕೊಂಡು
ಕಾಗದದ
ಮೇಲೆ ನಿಲ್ಲಲಾಗುವುದಿಲ್ಲವೆಂದು.